विंध्यवासिनी देवी मंदिर का इतिहास

विंध्यवासिनी माता का मन्दिर विंध्याचल पर्वत के ऊपर है माता का दर्शन करने के लिए दो रास्ते है एक सीढ़ियों के द्वारा दूसरा  आप पैदल भी जा सकते है ।यह एक ऐसा मंदिर है जहा दर्शन करने तो हिन्दू जाते है लेकिन पूजा का समान अक्सर मुसलमान ही बेचते । कहा जाता है कि यहां बस जाने मात्र से ही सारी मनोकामनाएं पूरी होती है और भक्त उनके पूर्ण स्वरूप का दर्शन पता है माता रानी का दरवार मे नवरात्री में नौ दिन तक बहुत भीड होती है उत्तर प्रदेश से हीनहीं बल्कि देश के कोनेकोने से लोग इनका दर्शन करने के लिए आए है ।यह माता जी का मंदिर विंध्याचल पर्वत मिर्जापुर उत्तर प्रदेश में है

मा विंध्याचल देवी का जन्म कथा

पौराणिक कथा के अनुसार द्वापर युग में मथुरा का राजा कंस था उसने अपनी  बहन की शादी वासुदेव जी के साथ  कि ।जब वह अपनी बहन को लेकर जा रहा था तो रास्ते में आकाश वाणी हुई की जिस बहन को लेकर तू इतना प्रसन्न होकर बिदाई कर रहा है उस बहन का 8 वा पुत्र ही तेरी मृत्यु का कारण बनेगा यह सुन कर कंस इतना दर गया कि उसने अपनी तलवार निकाल ली और अपनी बहन देवकी को मारने के लिए आगे बढ़ा वैसे ही वासुदेव जी  कंस से कहे आप इनको मत मानिए हमारी जो संतान होगी मै उसको आपको देदुंगा यह सुनकर कंस उनको लेजाकर जेल में बंद कर दिया ।जब जब उनको संतान हुई तब तब कंस ने उनको जमीन पर पटक कर मर डाला कुछ समय बाद

जब उनके 8 वे पुत्र का जन्म हुआ तो वासुदेव जी उसको लेकर आंनद बाबा के घर पर चले गए जहा पर यशोदा जी ने एक पुत्री को जन्म दिया था वासुदेव जी अपने पुत्र को वहा रख कर उनकी पुत्री को आपने साथ लेकर चले गए

जब कंस को पता चला तो वह जेल में आया और बच्चे को उनके हाथ से लेकर जैसे ही मारने के लिए जमीन पर पटका वैसे ही वो माया जमीन से उड़ गई और आसमान में जाकर अपने स्वरूप में आ गई कई की हे कंस तुझको मारने वाला जन्म लेलिया है ।उसके बाद वो कन्या विंध्य पर्वत पर जाकर विंध्यवासिनी माता कहलाने लगी ।

दूसरी कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार विंध्याचल पर्वत हिमालय को देखा तो उसे लगा कि हिमालय इतना विशाल पर्वत है मै उसके आगे कितना छोटा हूं यह देखकर उसको अपने ऊपर अफसोस होने लगा उसने ब्रह्मा जी की तपस्या की उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसको दर्शन दिया और उससे कहाहे वक्ष वरदान मांग यह सुनकर विंध्याचल पर्वत ने  सबसे विशाल पर्वत होने का वरदान मांगा तथा वस्तु कह कर ब्रह्मा जी चले गए विंध्याचल पर्वत अब विशाल होने लगा इतना विशाल हो गया कि सूर्य के प्रकाश को धरती पर आने ही नहीं देता थाजिससे धरती पर रहने वाले जीव जंतु मे हाहाकार मच गया सभी देवता मिलकर ब्रह्मा जी के पास गए ब्रह्मा जी ने विंध्याचल पर्वत के गुरु अगस्त ऋषि से बोला तो ऋषि अगस्त विंध्याचल पर्वत पर गए अपने गुरु को आता देख विंध्याचल झुकने लगा और नीचे आ गया  ऋषि ने कहा वक्ष ऐसे ही सोए रहना मै अभी आता हूं यह कहकर चले गए उसके बाद आए ही नहीं काफी समय इंतजार करने के बाद विंध्याचल ने शंकर जी की तपस्या की शिव जी ने दर्शन देकर कहा कोई छोटा या बड़ा नही होता है अगर तुमको बड़ा बनना है माता  गोरी को आपने पर्वत पर स्थान दो तुम आपने आप बड़े हो जाओगे और शंकर  जी ने माता पार्वती को कहा हे देवी आप यहां विराजमान हो जाइए और आज से आप विंध्यवासिनी माता के नाम से  जानी जाएंगी।

विंध्याचल मे त्रिकोण परिक्रमा क्या

प्राचीन काल विंध्यवासिनी कहा जाता था इस समय उस विंध्याचल माता कहा जाता है विंध्याचल माता विंध्य मे रहने वाली प्रथम माता है विन्ध्वासिनी माता विंध्याचल पर्वत पर मा लक्ष्मी के स्वरूप मे विराज मान है   ।मा लक्ष्मी के साथ यहां पर मा काली और मा सरस्वती भी विराजमान है यहां पर मा लक्ष्मी की चारो अवस्थावो की आरती होती है ।त्रिकोण परिक्रमा करने के लिए सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा करते हैं उसके बाद मा विंध्यवासिनी की पूजा करते है उसके बाद स्टेशन के पास हनुमान जी का मंदिर है उनका पुजन करते है उसके बाद बाद मा काली का दर्शन करते है उसके बाद भूतनाथ भैरव का दर्शन करते हैं।उसके बाद वहीं से मा अष्टभुजा का दर्शन करते है उसके बाद वहा से आगर रामेश्वर मे भगवान शिव का दर्शन करते हैं उसके बाद फिर दोबारा आकर मा विंध्यवासिनी का दर्शन करते है उसके बाद इनकी त्रिकोण परिक्रमा पूरी हो जाती है ।

विंध्याचल मे गंगा स्नान

विंध्याचल जाने वाले भक्त मिर्जापुर पहुंचने के बाद  मा विंध्याचल भगवती का दर्शन करने के लिए सबसे पहले भागीरथी गंगा में स्नान करते है उसके बाद मा विंध्यवासिनी का दर्शन करते है ऐसी मान्यता है भागीरथी गंगा में स्नान करने मात्र से आपके सारे पाप नष्ट हो जाते है क्योंकि यह पर  भागीरथी गंगा विंध्याचल पर्वत को स्पर्श कर रही है ऐसा मना गया है कि गंगा विंध्याचल पर्वत के ऊपर से जा रही है तो यह स्थान गंगा और विंध्याचल पर्वत का संगम हुआ इस लिए इस पावन गंगा के जल से स्नान करने से सारे पाप नष्ट हो जाएंगे ।उसके बाद माता रानी का दर्शन करने हर मनोकामना पूरी हो जाती है ।